गौतम बुद्ध नगर की डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट मेधा रूपम ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की है, जिसमें छात्र आकृति चौधरी की राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून के तहत हिरासत रद्द करते समय कोर्ट ने उन्हें कड़ी फटकार लगायी थी और सैलरी से 5 लाख रुपये का मुआवज़ा देने का निर्देश दिया गया था।
बेंच ने अपने आदेश में स्पष्ट चेतावनी दी कि गलत काम करने वाली ब्यूरोक्रेसी का ‘निरंकुशता’ वाला व्यवहार उत्तर प्रदेश को “ऑर्वेलियन डिस्टोपिया” (एक ऐसी जगह जहाँ सरकार का पूरा कंट्रोल हो और लोगों की आज़ादी न हो) में बदल सकता है।
जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस अचल सचदेव की बेंच ने माना था कि एनएसए के तहत चौधरी को लगातार हिरासत में रखना आर्टिकल 21 के तहत उनके मौलिक अधिकार का उल्लंघन था, क्योंकि हिरासत का आदेश और उसके आधार बिना किसी ठोस सबूत के थे और “बिना सोचे-समझे” जारी किए गए थे।
कोर्ट ने चौधरी को 5 लाख रुपये का मुआवज़ा देने का भी आदेश दिया और कहा कि यह रकम गौतम बुद्ध नगर की डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट मेधा रूपम (जिन्होंने हिरासत का आदेश जारी किया था) और इसके लिए ज़िम्मेदार अन्य अधिकारियों – “थाना प्रभारी तक” – की सैलरी से वसूली जाए।
25 वर्षीय चौधरी दिल्ली यूनिवर्सिटी से हिस्ट्री में ग्रेजुएट हैं और उन्हें अप्रैल 2026 में नोएडा में मज़दूरों के विरोध प्रदर्शन से जुड़े मामलों में गिरफ़्तार किया गया था। इसके बाद उत्तर प्रदेश पुलिस ने 13 मई को चौधरी और एक्टिविस्ट/पत्रकार सत्यम वर्मा के खिलाफ नेशनल सिक्योरिटी एक्ट, 1980 लगाने की घोषणा की थी। वे ज़्यादा वेतन की मांग को लेकर शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन से जुड़े मामलों में गिरफ़्तार किए गए कई अन्य कार्यकर्ताओं और मजदूरों में शामिल थे।
अपने 15 पेज के आदेश में, बेंच ने ब्यूरोक्रेसी और पुलिस की भूमिकाओं पर कई अहम बातें कहीं। कोर्ट ने कहा कि अधिकारियों को बहुत ज़्यादा अधिकार दिए जाते हैं क्योंकि उन पर नागरिकों के संवैधानिक और कानूनी अधिकारों, गरिमा, सम्मान और कल्याण को बनाए रखने की ज़िम्मेदारी होती है।
हालांकि, कोर्ट ने ज़ोर देकर कहा कि उन्हें यह याद रखना चाहिए कि उनकी “वफ़ादारी संविधान के प्रति है, न कि राजनीतिक कार्यपालिका के प्रति”। कोर्ट ने आगे कहा कि अधिकारी जनता की सेवा करने वाले सेवक होते हैं, और जनता ही “लोकतंत्र में असली मालिक” होती है।
कोर्ट ने चेतावनी दी कि जब नौकरशाह और पुलिस अधिकारी अपनी शपथ को नज़रअंदाज़ करते हैं और उसके उलट काम करते हैं, तो लोग उन्हें “ब्रिटिश राज की दमनकारी निशानी” के तौर पर देख सकते हैं, जिससे नागरिक अशांति का माहौल बन सकता है।
बेंच ने आगे कहा कि “नौकरशाही में गलत काम करने वाले लोग उत्तर प्रदेश राज्य को जल्द ही ‘ऑर्वेलियन डिस्टोपिया’ (एक ऐसी जगह जहाँ सरकार का बहुत ज़्यादा और दमनकारी नियंत्रण हो) में बदल देंगे”।
कोर्ट ने यह भी कहा कि बिना किसी ठोस वजह या सही प्रक्रिया के नागरिक आज़ादी में दखल देने वाली ज्यादतियों या गैर-कानूनी कामों को ठीक करते समय, न्यायपालिका पीड़ित नागरिकों को मुआवज़ा देने के लिए “सख्त आदेश” दे सकती है।
कोर्ट ने गौतम बुद्ध नगर की डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट मेधा रूपम के व्यवहार की खास तौर पर आलोचना की, जिन्होंने एनएसए के तहत हिरासत का आदेश जारी किया था।
कोर्ट ने माना कि जहाँ पुलिस रिपोर्ट में बिना किसी भरोसेमंद सबूत के सिर्फ़ आरोप लगाए गए थे, वहाँ डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट से उम्मीद की जाती थी कि वे एनएसए के सख्त प्रावधान लागू करने का फ़ैसला लेने से पहले रिकॉर्ड की ‘बारीकी से’ जाँच करें।
बेंच ने देखा कि चौधरी एक महिला स्टूडेंट एक्टिविस्ट थीं, जिनका कोई पिछला आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था, और सबूतों से यह नहीं पता चलता कि उन्होंने हिंसा भड़काई थी।
कोर्ट इस नतीजे पर पहुँचा: “गौतम बुद्ध नगर की डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट, जिन्होंने विवादित आदेश जारी किया, का व्यवहार निंदा के योग्य है।” कोर्ट ने आगे माना कि हालात से पता चलता है कि डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट चौधरी के ज़रिए “एक मिसाल कायम करना” चाहती थीं और दूसरों को मज़दूरों के समर्थन में सार्वजनिक जगहों पर बोलने और अपनी बात रखने की आज़ादी का इस्तेमाल करने से रोकना चाहती थीं।
(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)